Thursday, January 28, 2010

मत कहो आकाश में कुहरा घना है

recently, while surfing the net i came across this poem... this is one of my favorite poems. hope you like it.

मत कहो आकाश में कुहरा घना है,

यह किसी की व्यक्तिगत आलोचना है.

सूर्य हमने भी नहीं देखा सुबह से,
क्या करोगे, सूर्य का क्या देखना है.

इस सड़क पर इस कदर कीचड बिछी है,
हर किसी का पांव घुटनो तक सना है.

पक्ष और प्रतिपक्ष संसद में मुखर है,
बात इतनी है की कोई पुल बना है.

रक्त वर्षों से नसों में खौलता,
आप कहते हैं क्षडिक उत्तेजना है?

हो गयी हर घाट पर पूरी व्यवस्था,
शौक से डूबे जिसे भी डूबना है.

दोस्तों अब मंच पर सुविधा नहीं है,
आजकल नेपथ्य में संभावाना है!!
-दुष्यंत कुमार

3 comments:

My Niche.... said...

Liked the poem...but faced gr8 difficulty in understanding!!! high time I should improve my hindi!!!

pranjal srivastava said...

haha... literature stuff. you'll need top class hindi to understand that... i myself don't understand the last line of poem... ajkal nepathya me sambhaavna hai!!

Roli said...

pranjal sir, really?
well nepathya means back stage i hope u understand now
:-)